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बस्तर गोंचा पर्व, छ: सौ साल से मनाये जाने वाला महापर्व | Bastar Goncha Festival

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बस्तर गोंचा पर्व Bastar Goncha Festival में गोंचा रथ यात्रा विधान सालों से जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर विराजित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा पुरे देश मे उत्साह और भक्तिभाव के साथ मनाई जाती है बस्तर में गोंचा पर्व भगवान श्री जगरनाथ व देवी सुभद्रा और दाउ बलराम के रथ यात्रा का पर्व है इस पर्व को प्रति वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से लेकर एकादशी तक पूरे 10 दिनों तक बस्तर वासियों के द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है।

बस्तर के जगदलपुर नगर में मनाए जाने वाले रथयात्रा पर्व एक अलग ही परंपरा, एक अलग ही संस्कृति देखने को मिलती है। सामान्यतः विशालकाय रथों को परंपरागत तरीकों से फूलों तथा कपड़ों से सजाया जाता है और रथयात्रा पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। गली गली मे जगन्नाथ भगवान के रथ खींचने की होड़ मची रहती है. आषाढ़ मास में हल्की फ़ुहारो के साथ जय जगन्नाथ जयकारा गुंजता रह्ता है।

  • गोंचा पर्व का इतिहास
  • गोंचा पर्व में ब्राह्मणों का महत्व
  • क्या है चंदन जात्रा
  • रथ यात्रा कैसे शुरू हुई
  • हेरा पंचमी का रस्म
  • भगवान जगरनाथ के स्वागत में दी जाती है तुपकी से सलामी
  • कपाट पेरा रस्म
  • देव सौनी रस्म

गोंचा पर्व का इतिहास :-

बस्तर गोंचा पर्व में गोंचा रथ यात्रा विधान सालों से जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर मनाया जाता है। ऐसी लोक मान्यता है की जब देवी सुभद्रा श्री कृष्ण से द्वारिका भ्रमण की इच्छा जाहिर करती है तब श्री कृष्ण बलराम अलग अलग रथ में बैठकर उन्हें द्वारिका का भ्रमण करवाते है और इन्ही की स्मृति में प्रतिवर्ष उड़ीसा के पुरी में रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। और इसी के तर्ज पर बस्तर में भी रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है जिसे गोंचा पर्व के नाम से भी जाना जाता है।

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उड़ीस के राजा इन्द्रदुम ने पहली बार पुरी में रथ यात्रा का आयोजन किया था इस पर्व का नाम उन्होने अपनी पत्नी गुंडीजा के नाम पर रखा था इसलिए उड़ीसा में इसे गुंडीजा पर्व और बस्तर में गोंचा पर्व के नाम से जाना गया। इस पर्व की शुरूवात बस्तर में 610 वर्ष पहले काकतीय वंश के शासक पुरषोत्तम देव ने की थी जब पुरषोत्तम देव जगरनाथ पुरी की यात्रा से लौटे थे तब उन्होंने यहां पर गोंचा पर्व का प्रारंभ किया था।

पुरी में उन्हें रथपति की उपाधि देकर 16 पहिए वाला रथ भेट स्वरूप अर्पित किया गया था राजा पुरषोत्तम देव पुरी से श्री जगरनाथ, देवी सुभद्रा और बलराम जी के विग्रहो को बस्तर लेकर आये थे उन्होने जगदलपुर में इन विग्रहों को स्थापित किया और 16 पहियों में से चार पहिए वाली रथ को श्री जगन्नाथ जी को और बाकी बचे 12 पहिए वाले रथ को दशहरा पर्व के अवसर पर अपनी कुलदेवी माता दंतेश्वरी को अर्पित किया और इस प्रकार से प्रारंभ हुआ बस्तर में गोंचा पर्व।

गोंचा पर्व में ब्राह्मणों का महत्व :-

राजा पुरषोत्तम देव के साथ पुरी से 360 आरणीय ब्राह्मण भी आये थे यह 360 आरणीय ब्राह्मणों को राजा पुरषोत्तम देव ने बस्तर के विभिन्न ग्रामों में आश्रय दिया और उन्हें जीवन यापन के लिए कृषि भूमि दी और इन्हीं ब्राम्हण परिवारों के नेतृत्व में प्रति वर्ष श्री जगन्नाथ की उपासना का पर्व गोंचा पर्व मनाया जाता है।

गोंचा पर्व की शुरूवात जिस्ट शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को चंदन जात्रा के रस्म से होती है इस दिन 360 आरणीय ब्राह्मण परिवार और अन्य समाज के लोगो के द्वारा इंद्रावती नदी से पवित्र जल लाकर जगन्नाथ मंदिर में श्री जगरनाथ देवी सुभद्रा और बलराम जी के विग्रह को स्नान कराया जाता है और उन्हें चंदन लगाया जाता है।

क्या है चंदन जात्रा :-

चंदन जात्रा में श्री जगरनाथ देवी सुभद्रा और बलराम जी की प्रतिमा को मंदिर में लाकर उनकी विधि विधान से पूजा की जाती है ऐसी लोक मान्यता है की चंदन जात्रा के पश्चात श्री जगरनाथ् अस्वस्थ हो जाते है और लगातार 15 दिन तक आषाण कृष्ण प्रतिमा से लेकर आषाण अमावस्य तक श्री जगरनाथ के दर्शन नहीं हो पाते।

इस काल अवधि को अंशर काल कहा जाता है। उसके बाद आषाढ़ शुक्ल प्रथमा को श्री जगरनाथ स्वास्थ्य होकर अपने श्रद्धालुओं को दर्शन देते हैं इस विधान को नेत्रउतस्व कहा जाता है।

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रथ यात्रा कैसे शुरू हुई :-

बस्तर में रथयात्रा आषण शुक्ल द्वितीया को जगनाथ मंदिर में स्थापित श्री जगरनाथ देवी सुभद्रा और बलराम जी की विग्रहो के सात जोड़े और एक सिट जगरनाथ की प्रतिमा मतलब पूरे 22 प्रतिमा को चार पहिए वाले तीन रथों में आरूण किया जाता है और उसके बाद रथ यात्रा प्रांरभ किया जाता है।

यह रथ फूलों और कपड़ों से सुसज्जित होता है इस रथ का निर्माण प्रति वर्ष पियूस और साल की लकड़ी से ग्रामिणों के द्वारा निमार्ण किया जाता है। जिसकी चौड़ाई लगभग 20 फिट और लंबाई लगभग 26 फिट की होती है इस रथ के निर्माण का कार्य सात दिनों में पूरा हो जाता है जिसके बाद इस चार पहिए वाले तिनों रथों को गोल बजार से परिक्रमा कराते हुए सिरहासार भवन में लाया जाता है।

सिरहासार भवन में इन विग्रह को 9 दिनों तक अस्थाई रूप से स्थापित किया जाता है और इनकी पूजा-अर्चना में भजन कीर्तन सत्यनारायण की कथा और रामायण पाठ आदि का आयोजन किया जाता है इस पर्व में श्री जगन्नाथ की पूजा में उन्हें अंकुरित मूंग के दाने और पके हुए कटहल को अर्पित किया जाता है और प्रसाद के रूप में अंकुरित मूंग के दाने के साथ गुड़ मिलाकर दिया जाता है जिसे गजा मूंग कहते है।

हेरा पंचमी का रस्म :-

हेरा पंचमी का रस्म आषाण शुक्ल में किया जाता है ऐसी लोक मान्यता है की श्री जगरनाथ देवी लक्ष्मी को बिना बताए हुए ही भ्रमण के लिए निकल गए थे चार दिनों तक की श्री जगन्नाथ के नहीं लौटने पर देवी लक्ष्मी उनको ढूंढते-ढूंढते यहां पहुंचती है अर्थात इस रस्म में आरणीय ब्राह्मणों के द्वारा देवी लक्ष्मी की डोली को यहां लाया जाता है और उनके द्वारा श्री जगन्नाथ को ढूंढने का उपक्रम किया जाता है।

जिसके बाद लक्ष्मीनारायण संवाद को गीत के माध्यम से व्यक्त किया जाता है अतः देवी लक्ष्मी गुस्से से वापस लौट जाती है फिर आषाढ़ शुक्ल सप्ष्मी को 56 भोग का आयोजन किया जाता है सप्तमी को उपनयन का रस्म किया जाता है और उसके बाद आषण शुक्ल दशमी को वापस श्री जगरनाथ देवी सुभद्रा बलराम के विग्रह को रथ में आरूण करके रथ की परिक्रमा कराते हुए उन्हे जगरनाथ मंदिर में लाया जाता है इस विधान को बहुड़ा गोंचा या बाहाड़ा गोंचा कहा जाता है।

भगवान जगरनाथ के स्वागत में दी जाती है तुपकी से सलामी :-

भारत में बस्तर के अतिरिक्त तुपकी चलाने की परंपरा कहीं भी नहीं है इसीलिए इस पर्व का मुख्य आकर्षण है तुपकी चलाना। जगदलपुर में श्री जगरनाथ के स्वागत में और उनके सम्मान में तुपकी चलाने की परंपरा है। तुपकी वास्तव में बंदूक का प्रतिक होता है।

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बस्तर में बंदूक को तुपक कहा जाता है और तुपक शब्द से ही तुपकी बना है। बंदूक रूपी तुपकी को बांस से बनाया जाता है और उसमें गोली के रूप में जंगली लता के फल पेंगू का इस्तेमाल किया जाता है।

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कपाट पेरा रस्म :-

कपाट पेरा रस्म जगन्नाथ मंदिर के द्वार में किया जाता है। रूटी हुई देवी लक्ष्मी श्री जगन्नाथ को मंदिर में प्रवेश करने नहीं देती है और प्रवेश द्वार को बंद कर देती हैं उसके बाद से श्री जगन्नाथ जी के द्वारा देवी लक्ष्मी को मनाया जाता है और अंत में देवी लक्ष्मी दरवाजे को खोलती है और फिर उसके बाद श्री जगन्नाथ के विग्रहों को मंदिर में स्थापित किया जाता है।

देव सौनी रस्म :-

देव सौनी का रस्म आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन किया जाता हैं इस दौरान श्री जगरनाथ शैयन कक्ष में चले जाते है और लगातार चार महीने तक जागृत नहीं होते है इस दौरान किसी प्रकार का शुभ कार्य नहीं किया जाता है उसके बाद कार्तिक शुक्ल एकादसी के दिन, जिस छत्तीसगढ़ अंचल में देवउठनी एकादशी का पर्व मनाया जाता है।

उस दिन श्री जगरनाथ शौन कक्ष से बहार निकलते है उसके बाद अपने श्रद्धालुओं को दर्शन देते है फिर सभी प्रकार के शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं तो इस प्रकार से बस्तर अंचल में बस्तर वासियों के द्वारा गोंचा पर्व को हर जाति समुदाय के लोगों के द्वारा मनाया जाता है अगर यह जानकारी अच्छी लगी हो तो कमेंट करके जरूर बताऐ और ऐसी ही जानकारी daily पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करे इससे आप को हर ताजा अपडेट की जानकारी आप तक पहुँच जायेगी।

!! धन्यवाद !!

 

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