देवी देवताओं के पारंम्परिक रंगो से सजता है, कोण्डागांव का वार्षिक मेला | Kondagaon Mela

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कोंडागांव मेला Kondagaon mela बस्तर संभाग के अन्य मेलों में से सबसे अलग मेला है कोंडागांव मेला 1330 से चली आ रही मेले की परम्परा आज भी वैसे ही है… कोंडागांव का पारंपरिक मेला सालभर में एक बार मनाया जाने वाला एक सामूहिक उत्सव कि तरह होता है, जिसे सभी गांव के लोग अपने-अपने इष्ट देवी-देवताओं के समागम समारोह के रूप में मनाते हैं।

यह मेला बस्तर संभाग में काफी मसहूर है… जिसे देखने कई अलग-अलग जगह से लोग आते है…कोंडागांव जिला अपनी ऐतिहासिकता के साथ बहुरंगी आदिवासी संस्कृति, धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक सभ्यता एवं लोक परम्पराओं के निर्वहन के चलते अपना अलग स्थान रखता है। कोंडागांव में सप्ताहभर चलने वाले पारम्परिक मेला मंडई का आगाज विधानानुसार मंगलवार को ही होता है।

कब किया जाता है? कोंडागांव मेला का आयोजन :-

कोंडागांव मेला का आयोजन हिंदू पंचांग और चंद्र स्थिति के कारण माघ शुक्ल पक्ष में प्रथम मंगलवार को मेला का आयोजन किया जाता है… होली त्यौहार से लगभग 10 दिन पहले आयोजित होने वाले इस मेले में हर वर्ष आसपास के गांवो से ग्रामीणों अपने-अपने इष्ट देवी-देवताओं के साथ मेला में पहुचते है… जंहा आस्था और संस्कृति के कई अलग अलग रंग देखने को मिलते हैं।

इस सप्ताहभर चलने वाले मेले का एक अन्य आर्कषण देखने को भी मिलता है,, जो कोंडागांव के आसपास के ग्रामों के द्वारा नृतक दलों की ओर से पारम्परिक लोक नृत्यों की सुन्दर प्रस्तुतियां होती है। इनमें प्रचलित आदिम नृत्य जैसे कोंकरेग, रेला, हूल्की, माटी मांदरी, गेडी, गौर नृत्य , जिन्हे स्थानीय ग्राम कोकोड़ी, किबई बालेंगा, पाला, तेलंगा, खरगांव, गोलावण्ड के नर्तक दल प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता हैं।

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24 परगना के इष्ट देवी-देवताओं का आगमन :-

कोंडागांव मेला में लगभग 24 परगना के इष्ट देवी-देवताओं व ग्राम के समस्त ग्रामवासी माता का छतर, डंगई लॉट, बैरक आदि सहित उपस्थित होते हैं. मेले में गांव से आए ग्रामवासी, सिरहा, गायता, पुजारी, मांझी, मुखिया एकत्रित होकर मंदिर के पुजारी से विशेष अनुमति लेकर 24 परगना के देवी-देवताओं को विधि विधान से पुजा एंव जतरा संपन्न किया जाता है… प्रत्येक वर्ष कोण्डागांव के वार्षिक मेले में आस-पास के ग्रामों जैसे पलारी, भीरागांव, बनजुगानी, भेलवापदर, फरसगांव, कोपाबेड़ा, डोंगरीपारा के ग्रामीण देवी देवता, माटीपुजारी, गांयता सभी सम्मिलित होते हैं।

मेले की प्रमुख देवी पूरला देवी माता :-

मेले की प्रमुख देवी पूरला देवी माता- कोंडागांव मेला के सबसे पहले दिन पलारी गांव की पूरला देवी माता की पूजा कि जाती है… जंहा फूल डोबला (फूल दोना) का आदान-प्रदान किया जाता हैं, विधिवत गायता, पुजारी व सभी ग्रामीण एकत्रित होकर ढोल-नगाड़े, मोहरीबाजा आदि पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के साथ भेंट कर स्वागत करते हुए… मेला परिक्रमा का कार्यक्रम प्रारंभ किया जाता है, पूरला देवी माता के आगमन के बाद ही मेला स्थल का परिक्रमा किया जाता है।

देवी-देवताओं के लाट, आंगा, डोली आदि मेला में परिक्रमा करते है.. जिसके बाद अन्य सभी देवी-देवता मेला की परिक्रमा किया जाता हैं.. कोंडागांव मेले में परिक्रमा के दौरान कुछ देवी-देवता लोहे की कील की कुर्सियों में विराजमान रहते हैं… मेला परिक्रमा के पश्चात देवी-देवता एक जगह एकत्रित होकर अपनी-अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं…जिसे देव खेलाना या देव नाच कहा जाता हैं। जिसके बाद मेले के शुभारंभ की घोषणा की जाती है।

मेला के पूर्व माता पहुंचानी (जातरा) का आयोजन :-

मेला के पूर्व माता पहुंचानी (जातरा) का आयोजन किया जाता है, जो वर्षो से चला आ रहा है जिसमें गांव के प्रमुख पटेल,कोटवार एकत्रित होकर देवी-देवताओं का आहवान कर उन्हें मेला में आने के लिए आमंत्रित करते है… और देवताओं से निवेदन कि जाती है, कि आने वाले साल भर खेती कार्य इत्यादि में किसी प्रकार का कोई प्रकोप बीमारी जैस विघ्न ना हो।

मेला की कुछ अनोखी परम्परा :-

मेला में देव परिक्रमा के पहले परम्परा अनुसार मेला समिति से जुड़े कुछ लोग पारम्परिक बाजे-गाजे के साथ राजस्व अधिकारियों को सम्मान के साथ परघा कर मेले में ले जाते है…जहां उन्हें मेला में शामिल होने आए देवी-देवताओं से परिचित किया जाता है… और राजस्व अधिकारियों को हजारी फूल का हार पहनाया जाता है। जिसके पश्चात अधिकारी व जनप्रतिनिधियों के मेला परिसर की परिक्रमा कर सात दिनों तक चलने वाले मेले की शुरूआत कर दी जाती है…

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यह परम्परा यहां वर्षो से चली आ रही है जो आज भी प्रचलित है। यह मेला पूरे सप्ताहभर चलता है..जिसे देखने कोंडागांव के आस पास एंव दूर-दराज से लोग मेला गुमने आते है जंहा मीना बजार, झुला, मौत कुआं के साथ-साथ कई अनेक प्रकार की चीजे देखने को मिलता है.. यहां कोंडागांव का पारम्परिक मेला मंडई में आपको भी एक बार जरूर आना चाहिए।

कैसे पहुचें :-

कोण्डागॉव के समीप एयरपोर्ट्स स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट रायपुर कोण्डागॉव से लगभग 250 कि.मी. जगदलपुर एयरपोर्ट से कोण्डागॉव लगभग 80 कि.मी. की दूरी पर है। बस मार्ग राष्ट्रीय राज मार्ग क्रमांक 30 जिले से होकर गुजरती है। तथा राष्ट्रीय राज मार्ग क्रमांक 49 जिला कोण्डागॉव से नारायणपुर के लिये स्थापित किया गया है।

नियमित उपलब्ध बस सेवाओं से छत्तीसगढ़ राज्य के किसी भी हिस्से से कोण्डागॉव बडे आसानी से पहुंचा जा सकता है। कोण्डागॉव जिला जगदलपुर और रायपुर जैसे प्रमुख शहरों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। जगदलपुर से कोण्डागॉव 80 किलोमीटर एंव रायपुर 250 किमी है जिले में यातायात का प्रमुख साधन सडक मार्ग है। अगर यह जानकारी अच्छी लगी हो तो कमेंट करके जरूर बताऐ और ऐसी ही जानकारी daily पाने के लिए हमारे Facebook Page को like करे इससे आप को हर ताजा अपडेट की जानकारी आप तक पहुँच जायेगी।

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