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बस्तर का पहला पारम्परिक नवाखानी त्यौहार – Bastar Nawakhani festival

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बस्तर का पहला पारम्परिक नवाखानी त्यौहार Nawakhani festival बस्तर Bastar में आदिवासियों के नए फसल का पहला त्यौहार होता है, बस्तर में सितम्बर के महीने में एक के बाद त्योहारों का दौर शुरू हो जाता है, यहा पर फसल को खाने के पहले उसकी पूजा अर्चना करना यहाँ का रिवास है,

पर बारिश के बाद जिस त्यौहार का इंतज़ार होता है वह है नयाखानी त्यौहार Nawakhani festival जो लगातार अलग-अलग गांवो में अलग-अलग तिथियों में मनाया जाता है।

किसान इसे अपनी सुविधा अनुसार मनाते है। इस दिन घर के सभी लोग और अपने रिश्तेदार चाहे वो जहाँ भी रहते हों अपने पुस्तैनी घर में जमा होते हैं। बस्तर में किसी भी फसल को उपयोग करने से पहले उसकी पूजा अर्चना की जाती है,

इसलिए जब धान की फसल पक जाती है, तो उसको उपयोग करने से पहले एक त्यौहार मनाया जाता है, जिसे “नयाखानी Nawakhani” कहते है।

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नवाखानी त्यौहार Nawakhani festival अन्य फसलो के त्योहारों से ज्यादा महत्व होता है, इस त्यौहार में देवी अन्नपूर्णा यानि लक्ष्मी की पूजा की जाती है, जो हमें अन्न प्रदान करती है अन्न बस्तर का प्रमुख भोजन है।

हालाँकि हर फसल को खाने से पहले उसकी पूजा अर्चना करना यहाँ का रिवास है, जैसे गर्मियों में आम लगने के बाद उसकी पूजा कर के ही उसे खाने का रिवाज है, और इस लिए यहाँ आमा तिहार आम का त्यौहार मनाया जाता है।

कैसे मनाया जाता है नवाखानी त्यौहार

नवाखानी त्यौहार खेतों में जब धान पूरी तरह पक कर तैयार हो जाता है, तो ग्रामीण अपनी पुरे वाद्य यंत्रों के साथ खेत में पहुचते है, और एक मुठ्ठी धान की बाली तोड़ कर उसे कांसे के बर्तन में नए कपड़ों को बांध कर ढक देते है, और उस नई

फसल को कूटकर इसमें गुड और चिवड़ा मिला कर देवी अन्नपूर्णा और घर के देवी देवताओं को पूजा करते है और उसे प्रसाद के रूप में पुरे परिवार बैठकर ग्रहण करते है चिवड़ा ग्रहण करने के बाद में मांसाहार तथा मदिरापान भी सम्मिलित किया जाता है।

इस पर्व festival में पारिवारिक संबंधों का विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है, नवाखानी त्यौहार Nawakhani festival के दिन वर-वधू और दामाद पूर्व में विवाहित बेटी-दामाद तथा उनके ससुराल पक्ष को विशेष रूप से बुलाया जाता है, बस्तर में आदिवासी समाज में भावी वधू या दामाद को भी आमंत्रित करने की परम्परा है, जो सामाजिक प्रक्रिया का एक अंग है।

इस त्यौहार में आये सभी सगा लोगो से मिलकर एक दूसरे को जानने और समझने का अवसर मिलता है, पर वर्तमान में भावी पीढ़ी इन रस्मों और परम्परा से संकोचवश दूर होती जा रही है।

इस दिन से ही वैवाहिक संबंधों को जोड़ने के लिए वर-वधू की तलाश शुरू कर दी जाती है और परिवार में योग्य युवक युवतियों के लिए संबंध तय हो जाने के बाद सही समय देखकर विवाह का आयोजन किया जाता है।

यह त्यौहार लगभग तीन दिनों तक चलता रहता है, मुख्य रूप से प्रथम दिवस देवी देवता की पूजा अर्चना किया जाता है, और सामाजिक आवभगत तथा आतिथ्य सत्कार का होता है तथा

दूसरा दिन बासी तिहार मौज मस्ती, खाने-पीने और आनंद का दिन और तीसरा दिन एक दुसरे के घर जाकर नवाखानी का बधाई व शुभकामनायें देते है। और बड़ों का पांव छूकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं,और वहीं युवा वर्ग शुभकामनाएं व्यक्त करते हैं।

यह सिलसिला पुरे महीने चलता है सभी गाँवों में यह पर्व अलग-अलग तिथियों में मनाया जाता है और इस दौरान कब्बडी एंव अन्य खेलों का भी आयोजन किया जाता है, और ग्रामीणों द्वारा एक दुसरे के घर जाकर नवाखानी की बधाई

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