उड़द की उन्नत खेती करने का आसान तरीका कमाएं बेहतर मुनाफा – urad ki kheti

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उड़द की खेती urad ki kheti हमारे देश में उड़द का उपयोग मुख्य रूप से दाल के लिये उपयोग किया जाता है। इसकी दाल अत्याधिक पोषक होती है। उड़द की उन्नत खेती खरीफ और जायद के रूप में की जा सकती है। यह आहार के रूप में अत्यंत पौष्टिक होती है जिसमे प्रोटीन 24 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेट 60 प्रतिशत और कैल्सियम व फास्फोरस का अच्छा स्रोत है।

उड़द को दाल के साथ-साथ भारत में भारतीय व्यंजनों को बनाने में भी प्रयुक्त किया जाता है तथा इसकी हरी फलियाँ से सब्जी भी बनायी जाती है।उड़द का दैनिक आहार में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। 

उड़द शरीर के लिए अत्यंत पौष्टिक होने के साथ-साथ उड़द की मार्केट डिमांड भी अच्छी है. उत्पादन की दृष्टिसे देखा जाए तो भूमि को बिना नुकसान पहुंचाए ये उपज भी अच्छी देती है. वहीं इससे बनने वाला खाद भूमि को पोषक तत्व प्रदान करता है. चलिए आपको बताते हैं कि कैसे आप बहुत कम लागत में उड़द की खेती कर सकते हैं।

उड़द की खेती के लिए भूमि का चयन

उड़द की खेती urad ki kheti विभिन्न प्रकार की भूमि में होती है। हल्की रेतीली, दोमट या मध्यम प्रकार की भूमि जिसमें पानी का निकास अच्छा हो उड़द के लिए अधिक उपयुक्त होती है। पी.एच.मान 7-8 के बीच वाली भूमि उड़द के लिए उपजाऊ होती है। अम्लीय व क्षारीय भूमि उपयुक्त नहीं है।

वर्षा आरंभ होने के बाद दो-तीन बार हल चलाकर खेत को समतल करना चाहिए। वर्षा आरंभ होने से पहले बोनी करने से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है। साथ ही खेत को समलत करके उसमें जल निकास की उचित व्यवस्था कर देना भी बेहतर है।

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उड़द के खेत की तैयारी

उड़द के खेत की तैयारी भारी मिट्टी पर 2 से 3 बार जुताई करना जरूरी है. जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत को समतल बना लेना फायदेमंद है. इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है. खरीफ में इसके बीजों को 12 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बोया जा सकता है, जबकि ग्रीष्मकालीन समय में 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीजों को बोया जा सकता है।

उड़द की खेती में रखें इन बातों का ध्यान

दलहनी फसलों में उड़द कीलोक्रियता सबसे अधिक है. हमारे देश के लगभग हर राज्य में इसकी खेती होती है, यही कारण है कि उड़द को वार्षिक आय बढ़ाने वाला फसल भी कहा जाता है. इसके खेती के लिए जायद का मौसम सबसे उपयुक्त है।

जलवायु

उड़द की खेती urad ki kheti के लिए उष्ण जलवायु सबसे उपयुक्त मानी गई है, यह फसल उच्च तापक्रम को सहन करने में पूरी तरह से सक्षम है. यही कारण है कि इसकी खेती सबसे अधिक उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में होती है।

तापमान

उड़द की खेती के लिए सिंचाई सुविधाओं का होना जरूरी है. आम तौर पर 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना गया है. हालांकि, उड़द बड़ी आसानी से 43 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान भी सह सकती है. अच्छी सिंचाई मिलने का मतलब जलभराव से बिलकुल नहीं है, इस बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए. जलभराव पूरे उत्पादन को नष्ट कर सकता है।

सिंचाई

उड़द वर्षा के अभाव में फलियों के बनते समय सिंचाई की जानी चाहिए.इस फसल को 3 से 4 सिंचाई की जरूरत पड़ती है. पहली सिंचाई पलेवा के रूप में और बाकि की सिंचाई 20 दिन के अन्तराल पर करनी चाहिए।

कटाई

उड़द की कटाई के लिए हंसिया का उपयोग किया जाना चाहिए. ध्यान रहें कि 70 से 80 प्रतिशत फलियों के पकने पर ही कि कटाई का काम किया जाना चाहिए. फसल को खलिहान में ले जाने के लिए बण्डल बना लें।

उड़द की प्रजातियाँ

उड़द की प्रजातियाँ – मुख्य रूप से दो प्रकार की प्रजातियाँ पायी जाती है, पहला खरीफ में उत्पादन हेतु जैसे कि – शेखर-3, आजाद उड़द-3, पन्त उड़द-31, डव्लू.वी.-108, पन्त यू.-30, आई.पी.यू.-94 एवं पी.डी.यू.-1 मुख्य रूप से है, जायद में उत्पादन हेतु पन्त यू.-19, पन्त यू.-35, टाईप-9, नरेन्द्र उड़द-1, आजाद उड़द-1, उत्तरा, आजाद उड़द-2 एवं शेखर-2 प्रजातियाँ है। कुछ ऐसे भी प्रजातियाँ है, जो खरीफ एवं जायद दोनों में उत्पादन देती है,  जैसे कि टाईप-9, नरेन्द्र उड़द-1, आजाद उड़द-2, शेखर उड़द-2ये प्रजातियाँ दोनों ही फसलो में उगाई  जा सकती है।

उड़द की बुवाई

उड़द की बुवाई – बुवाई खरीफ व जायद दोनों फसलो में अलग-अलग समय पर की जाती है, खरीफ में जुलाई के प्रथम पक्ष में बुवाई की जाती है, जायद में 15 फरवरी से 15 मार्च तक बुवाई की जाती है, जहाँ तक रहा सवाल बुवाई के तरीके का, उड़द की बुवाई हल के पीछे कुडों में करना चाहिए, खरीफ में कूंड से कूंड की दूरी 30 से 45 सेमी. रखना अति उत्तम है, जायद में कूंड से कूंड की दूरी 25 से 30 सेमी. रखना चाहिए, बुवाई के तुरंत बाद हल्का पाटा लगा देना चाहिए, जिससे की हमारी नमी सुरक्षित बनी रह सके, यह करना जायद में अति आवश्यक है।

उड़द बीज की मात्रा

उड़द बीज की मात्रा समयनुसार डाली जाती है, खरीफ में 12-15 किलोग्राम प्रति हेक्टर प्रयोग करनी चाहिए, इसकी जायद में 15-18 किलोग्राम प्रति हेक्टर प्रयोग करते है, क्योकि जायद में पौधा कम बढ़ता है। बीज का शोधन करना अतिआवश्यक है, बीज को 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम अथवा 2 ग्राम थीरम से प्रति किलोग्राम बीज की दर शोधित करने के बाद, उड़द के राईजोबियम कल्चर के एक पैकेट से 10 किलोग्राम बीज का उपचार करना चाहिए।

उड़द की फसल  में जल प्रबंधन

खरीफ की फसल में वर्षा कम होने पर फलियाँ बनते समय एक सिंचाई करने की अति आवश्यकता पडती है, तथा जायद की फसल में पहली सिंचाई बुवाई के 30-35 दिन बाद करनी चाहिए, इसके बाद आवश्यकतानुसार 10-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए।

उड़द की फसल में खाद एवं उर्वरक

उड़द दलहनी फसल होने के कारण अधिक नत्रजन की जरूरत नहीं होती है क्योकि उड़द की जड़ में उपस्थित राजोबियम जीवाणु वायुमण्डल की स्वतन्त्र नत्रजन को ग्रहण करते है और पौधो को प्रदान करते है।

पौधे की प्रारम्भिक अवस्था में जब तक जड़ो में नत्रजन इकट्ठा करने वाले जीवाणु क्रियाशील हो तब तक के लिए 15-20 किग्रा नत्रजन 40-50 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय खेत में मिला देते है।

उड़द में खरपतवार नियंत्रण

वर्षा कालीन उड़द की फसल में खरपतवार का प्रकोप अधिक होता है जिससे उपज में 40-50 प्रतिशत हानि हो सकती है। रसायनिक विधि द्वारा खरपतवार नियन्त्रण के लिए वासालिन 1 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी के घोल का बुवाई के पूर्व खेत में छिड़काव करे। फसल की बुवाई के बाद परन्तु बीजों के अंकुरण के पूर्व पेन्डिमिथालीन 1.25 किग्रा 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है।

अगर खरपतवार फसल में उग जाते है तो फसल बुवाई 15-20 दिन की अवस्था पर पहली निराई तथा गुड़ाई खुरपी की सहायता से कर देनी चाहिए तथा पुन: खरपतवार उग जाने पर 15 दिन बाद निंदाई करनी चाहिए।

उड़द में लगने वाले रोग में नियंत्रण

उड़द में लगने वाले रोग में नियंत्रण उड़द में प्रायः पीले चित्रवर्ण या मोजैक रोग लगता है, इसमे रोग के विषाणु सफ़ेद मक्खी के द्वारा फैलता है, इसकी रोकथाम के लिए, समय से बुवाई करना अति आवश्यक है, दूसरा मोजैक अवरोधी प्रजातियों की बुवाई करनी चाहिए।

इसके साथ ही साथ मोजैक से ग्रषित पौधे फसल में दिखते ही सावधानी पूर्वक उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए और रसायनों का प्रयोग भी करते है, जैसे कि – डाईमिथोएट 30 ई. सी. 1 लीटर प्रति हेक्टर या मिथाईल-ऒ-डिमेटान 25 ई. सी. 1 लीटर प्रति हेक्टर की दर से छिडकाव करना चाहिए।

उड़द में लगने वाले कीटों पर नियंत्रण

उड़द में लगने वाले कीटों पर नियंत्रण – उड़द की फसल में थ्रिप्स, हरे फुदके, कमला कीट एवम फली भेदक कीट आदि लगते है, इसके नियंत्रण के लिए क्युनाल्फोस 25 ई. सी. 1.25 लीटर मात्रा प्रति हेक्टर की दर से 700-800 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए, जिससे की फसल में लगे कीटों का नियंत्रण हो सके।

पीला मोजेक विषाणु रोग : यह उड़द का सामान्य रोग है और वायरस द्वारा फैलता है। इसका प्रभाव 4-5 सप्ताह बाद ही दिखाई देने लगता है। इस रोग में सबसे पहले पत्तियों पर पीले रंग के धब्बे गोलाकार रूप में दिखाई देने लगते हैं। कुछ ही दिनों में पूरी पत्तियां पीली हो जाती है। अंत में ये पत्तियां सफेद सी होकर सूख जाती है।

उपाय : सफेद मक्खी की रोकथाम से रोग पर नियंत्रण संभव है। उड़द का पीला मोजैक रोग प्रतिरोधी किस्म पंत यू-19, पंत यू-30, यू.जी.218, टी.पी.यू.-4, पंत उड़द-30, बरखा, के.यू.-96-3 की बुवाई करनी चाहिए।

पत्ती मोडऩ रोग : नई पत्तियों पर हरिमाहीनता के रूप में पत्ती की मध्य शिराओं पर दिखाई देते हैं।  इस रोग में पत्तियां मध्य शिराओं के ऊपर की ओर मुड़ जाती है तथा नीचे की पत्तियां अंदर की ओर मुड़ जाती है तथा पत्तियों की वृद्धि रूक जाती है और पौधे मर जाते हैं।

उपाय : यह विषाणु जनित रोग है। जिसका संचरण थ्रीप्स द्वारा होता हैं। थ्रीप्स के लिए ऐसीफेट 75 प्रतिशत एस.पी. या 2 मिली डाईमैथोएट प्रति लीटर के हिसाब से छिडक़ाव करना चाहिए और फसल की बुवाई समय पर करनी चाहिए।

पत्ती धब्बा रोग : यह रोग फफूंद द्वारा फैलता है। इसके लक्षण पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं। 

उपाय :  कार्बेन्डाजिम 1 किग्रा 1000 लीटर पानी के घोल में मिलाकर स्प्रे करना चाहिए।

उड़द की फसल की कटाई और मड़ाई

उड़द लगभग 85-90 दिनों में पककर तैयार हो जाती है इसलिए ग्रीष्म ऋतु की कटाई मई-जुन में तथा वर्षा ऋतु की कटाई सित.-अक्टु. में फलियो का रंग काला पड़ जाने पर हसियाँ से कटाई करके खलियानो में फसल को सुखाते है बाद में बेल या, डण्डो या थ्रेसर से फलियों से दानों निकाल लिया जाता है।

उड़द की पैदावार

उड़द की पैदावार – भंडारण के लिए बीज को भंडारण करने से पहले अच्छी तरह से सुखा लेना चाहिए, क्योकि बीज में 10 प्रतिशत से अधिक नमी नहीं रहनी चाहिए, उड़द के भंडारण में स्टोरेज बीनस का प्रयोग करना चाहिए, सुखी नीम की पत्ती को बीज में मिलाकर भंडारण करने पर कीड़ो से सुरक्षा की जा सकती है।

जायद में उपज 10-12 कुंतल प्रति हेक्टर प्राप्त होती है तथा खरीफ में 12-15 कुंतल प्रति हेक्टर प्राप्त होती है। दोस्तो उम्मीद करता हूँ जानकारी आप को पसंद आई है। हो सके तो दोस्तो के साथ शेयर भी जरूर करे। ऐसी ही जानकारी daily पाने  के लिए Facebook Page को like करे इससे आप को हर ताजा अपडेट की जानकारी आप तक पहुँच जायेगी।

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